
फर्जी पंचनामा par गंभीर आरोप,,,,,
बिलासपुर :- बिलासपुर वन परिक्षेत्र के परिक्षेत्र अधिकारी पल्लव नायक एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में हैं। पहले भी उनके खिलाफ वन विभाग के कार्यों में भ्रष्टाचार की ठोस शिकायतें की गई थीं, जिनमें जीपीएस लोकेशन सहित वीडियो और फोटो साक्ष्य संलग्न किए गए थे। शिकायत उच्चाधिकारियों तक पहुंचते ही प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) ने पत्र क्रमांक सत/शिका/सा-912/1958,1955,1957,1956 के माध्यम से संबंधित मुख्य वन संरक्षक (CCF) को 15 दिनों के भीतर जांच पूरी करने के निर्देश दिए थे।
मुख्य वन संरक्षक ने भी त्वरित कार्यवाही करते हुए पत्र क्रमांक नि.स/सत.शिका/सा/4522, 4519, 4520, 4521 के माध्यम से डीएफओ को निर्देशित किया कि वे निर्धारित समय सीमा में निष्पक्ष जांच पूरी करें। परंतु दुर्भाग्यवश, जांच प्रक्रिया उस स्तर तक नहीं पहुंच सकी जहां से सच्चाई सामने आती, क्योंकि परिक्षेत्र अधिकारी पल्लव नायक ने डीएफओ और एसडीओ स्तर के अधिकारियों को अपने प्रभाव में लेकर जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
शिकायतकर्ता के अनुसार, उपवनमंडलाधिकारी (SDO) श्री अभिनव कुमार सिंह द्वारा उसे जांच हेतु पेश होने के लिए बुलाया गया था। शिकायतकर्ता समय पर उपस्थित भी हुआ, लेकिन न तो कोई अधिकारी वहां उपस्थित था और न ही उपस्थिति रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने दिया गया। दोबारा पेशी की तारीख मांगने पर भी कोई उत्तर नहीं मिला। इससे स्पष्ट होता है कि जांच की प्रक्रिया को केवल औपचारिकता के रूप में लिया जा रहा था।

इसके बाद SDO अभिनव सिंह ने पत्र क्रमांक 1862, दिनांक 19/09/2024 के माध्यम से रतनपुर के परिक्षेत्र अधिकारी देव सिंह ठाकुर और उड़नदस्ता प्रभारी सूरज मिश्रा को निर्देशित किया कि वे शिकायतकर्ता को साथ लेकर मौके पर जाकर जांच करें। लेकिन इस निर्देश की भी खुली अवहेलना की गई। शिकायतकर्ता को न तो सूचना दी गई और न ही जांच स्थल पर बुलाया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि शिकायतकर्ता की अनुपस्थिति में ही एक फर्जी पंचनामा तैयार कर लिया गया।
अब सवाल यह उठता है कि जब शिकायतकर्ता मौजूद ही नहीं था, तो किसके बयान पर, किन साक्ष्यों के आधार पर यह पंचनामा तैयार हुआ? यह सीधा-सीधा विभागीय प्रक्रिया का उल्लंघन और न्याय व्यवस्था के साथ मज़ाक है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि इस पूरे मामले में पल्लव नायक ने अपने “घोटाले के धन” से रतनपुर परिक्षेत्र अधिकारी देव सिंह ठाकुर और उड़नदस्ता प्रभारी सूरज मिश्रा को भी अपने पक्ष में कर लिया है। यही कारण है कि जांच प्रक्रिया पूर्ण रूप से पक्षपातपूर्ण बन गई है। देव सिंह ठाकुर और सूरज मिश्रा दोनों ही इस भ्रष्टाचार की चक्की में सहभागी प्रतीत हो रहे हैं।
यह स्थिति केवल एक व्यक्ति विशेष या अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे विभागीय तंत्र पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। शिकायतकर्ता ने इस घोटाले की पुनः शिकायत की है, लेकिन वह भी अब विभागीय ठंडे बस्ते में डाल दी गई है।
इस प्रकार की अनदेखी से यह स्पष्ट हो गया है कि पल्लव नायक केवल एक अधिकारी नहीं बल्कि भ्रष्टाचार के एक ऐसे केंद्र बन चुके हैं, जिन्होंने तंत्र को अपने अनुसार मोड़ लिया है।
यह मामला केवल एक व्यक्तिगत शिकायत नहीं बल्कि पूरे वन विभाग की कार्यशैली, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गहरा सवाल उठाता है। यदि शीघ्र ही इस पर निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच नहीं की गई, तो यह केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि संपूर्ण वन विभाग की साख को मिट्टी में मिला देगा।
अब उम्मीद केवल शासन-प्रशासन से है कि वह इस भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई करते हुए दोषियों को दंडित करे और वन विभाग की गरिमा को पुनर्स्थापित करे।